कश्ती है पुरानी मगर दरिया बदल गया,मेरी तलाश का भी तो नजरीयाबदल गया ।न शक्ल बदली न बदला मेरा किरदार,बस लोगो के देखने का नजरीयाबदल गया

 

न्यूज 22 इंडिया
स्वतन्त्र भारत में लोकतन्त्र के सजग प्रहरी पत्रकार समाज को आज जिस हिकारत की नजर से सियासत की तिजारत करने वाले देख रहे हैं।

उससे आधुनिकता के चासनी में डूबा वर्तमान समाज आज इस आगाज को देखकर थरथरा उठा है।अब सच की ईबारत लिखने वालों को भी सम्हल कर चलना मजबूरी हो गया!

अपराधियो शरीखे ब्यवहार इस सरकार में पत्रकार के साथ देखकर आम आदमी सकते मे‌ है!
अफसरशाही का बोलबाला‌ दिन रात बढ़ रहा है पब्लिक की परेशानी यथावत है लेकिन इस मिलावट के दौर में जब सच लिखने की सजा जेल‌ है कौन बिल्ली के गले में घंटी बांधेगा वाली बात चरितार्थ हो रही है!

भ्रष्टाचारी मुस्करा रहे हैं पब्लिक रो रही है।कलम के सिपाही अपनी जिन्दगी की तबाही को जानते हुये भी गरीब मजलूम असहाय की समस्याओं को अपने कलम के तेवर से धार देकर निराकरण कराने का काम करते रहे है।

समाज में अपनी अलग पहचान का निशान छोड़ते रहे‌ है। मगर अब वर्तमान उन पर भी हैरान करने वाला कारनामा कर रहा है!

बदला बदला सा मन्जर‌ है सरकार में रहकर भी कमीशन के बाजार में मुस्करा रहा रहबर है

ये सरकार को सारी खबर है मगर उन‌ पर कार्यवाही नही ! पांच साल में आलीशान बंगलों के मालिक बनकर लग्जरी गाड़ियों के काफिले में बादशाही जीवन बशर करते हैं सड़क से उठकर सियासत के सहारे शहर तक का सफर करने वाले शहंशाही जीवन बशर करते हैं।

उनकी न कोई जांच ना उन पर कानून की आंच! एक बार‌ सियासी ट्रेन से सफर करने का मौका मिल‌गया तो जीवन भर मजा काटते हैं। सरकार किसी की भी उनके सुख सुविधा में कटौती के बजाय‌ आजादी के बाद से मिल रही सुबिधा उनकी बपौती बन चुकी होती है।

आम आदमी इस महंगाई के माहौल में सिसक रहा है! महंगा तेल महंगाई बे मेल के सियासी खेल में रो रहा है वहीं सियासतदारों के साथ चलने वाली सैकडो गाड़ियों का काफिला महंगाई का मजाक उडा रहा‌ है। हर तरफ लूट मची है।

क्या‌ गलत है क्या सही है! इस पर अब कौन गौर फर्मायेगा! जब कलम का सिपाही ही जेल जायेगा!ब्यवस्था में आस्था जरुरी है मगर सच को सच नं लिखने की क्यो पैदा की जा रही मजबूरी है।हालात अगर ऐसा ही बना रहा

तो हर कदम पर तबाही का खामियाजा पब्लिक को भुगतना ही पड़ेगा! पत्रकार शब्द का विलोपन हो गया तो भ्रष्टाचारीयों से कौन डरेगा! गांव के बिकाश के लिये आये धन की लूट! तमाशा बनकर रह गया मनरेगा!ब्लाक मे हलाक होगया है बिकाश!

आलम ये है कि कोई भी पत्रकार ईमानदारी से अब पत्रकारिता करते हुए डरने लगा है, हर कलम के सच्चे सिपाही के अंदर एक अजीब सी खौफ ब्याप्त हो गई है, किसी तरह साहस जुटा कर कोई सच्चा कलम का सिपाही सच्चाई उजागर करता है तो उसे फिर यातना का शिकार होना पड़ता है।

कमीशन का खुलेयाम खेल पत्रकार सच उजागर कर दिया तो भेज दिया जायेगा जेल! नागरिक पुलिस की वर्दी पर मनमर्जी करने का आरोप तो पुराना फन्डा है लेकिन वर्तमान सरकार में और मजबूत हो गयी खुली छूट मे दहशत के साथ ही आधुनिक डन्डा है। अन्धेर मची है बुलडोजर की बात घर घर है मगर तेजी से बगावत का भर रहा है जहर। जगदीश सिंह संपादक के लेख से साभार

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